जूते का पेंचर
एक सुबह उठा और ऑफिस जाने को तैयार हो रहा था , तभी मैंने अपना जूता पहनने के दौरान तली में एक छोटी सी दरार देखी . हर बार की तरह मैंने अपने अपने दिल को तस्सली दी एक तारीख की . नौकरी पेशा आदमी हूँ तो सारे काम एक तारीख को ही होते है , कुछ पूरे हो जाते है कुछ अधूरे रह जाते है और कुछ ख्वाब हो जाते है . खैर तभी माँ ने आवाज़ दी " नाश्ता कर ले " .
किस्मत से उस दिन हल्की - हल्की बारिश हो रही थी . बाइक उठा कर ऑफिस पहुंच गया , और जैसे ही कॉलेज ( जहां मैं पढ़ाता हूँ ) की पार्किंग से अंदर जाने लगा तभी पैर में कुछ गीला सा लगा, उस दरार से पानी मेरे जूते के अंदर आगया था . बारिशो में भिगा रहने की आदत सी थी .टाइम पर क्लास लेना पहले कोचिंग पर फिर कॉलेज और फिर कोचिंग ,इन सब पर टाइम से पहुंचने के चक्कर में बारिश का ख्याल नहीं रहता था . कार भी नहीं थी मेरे पास . अब कॉलेज में इधर उधर आने जाने पर पानी जूते में आ ही रहा था , मैंने इस सब को इगनोर किया . मैं भी जिद्दी हूँ सोचा अब तो एक तारीख को ही नया जूता लूँगा .एक कारण और भी था लंबी छुट्टियों के बाद अभी अभी कॉलेज दोबारा ज्वाइन किया था और बारिश कोन सा रोज़ होने वाली थी ?
टाइम के साथ साथ जूते की तली में एक छोटा सा छेद हो गया अब ये थोड़ा सा असहज महसूस कराने लगा और मैं मर्दो वाले स्टाइल में पैर के ऊपर पैर करके भी नहीं बैठ सकता था , ऐसा करने से जूते का छेद दिखाई देने लगता . इसी बीच एक तारीख भी आगयी , सैलरी भी मिल गयी .घर के सारे खर्च वैगरह निकालने के बाद मैंने माँ से जूतों का बजट भी पास करवा लिया . मुझे पांचसौ रुपए मिल गए .
पर बदकिस्मती से उस दिन कॉलेज से कोचिंग जाते हुए मेरी बाइक में पेंचर हो गया जैसे - तैसे मैं कोचिंग पर पंहुचा , क्लास लेने के बाद पेंचर की दुकान पर गया . पेंचर वाला राजू भाई बोला " सर टायर खत्म हो गया है इसे बदलवालो " . मैंने कहाँ " अभी ऐसे ही चलने दो " खैर उसने जैसे ही पेंचर के बाद टायर में हवा भरी "भड़ाम " से टायर फट गया . राजू ने बड़ी कातिल स्माइल पास की और बोला.... अब ???? मैंने कहाँ "यार कोई जुगाड़ कर पैसे नहीं है इतने" वो बोला पुराना टायर लगवा लो तीनसौ रुपए लगेंगे . मैंने हामी भर दी और अपने वॉलेट से (जो अमूमन खली ही रहता है) पैसे निकल कर उसे दे दिए .
पर मेरे जूते का बजट खराब हो गया . पेंचर लगाने के दौरान मुझे एक तरकीब सूझ गयी . कुछ दिन ओर असहजता से बीते और लगभग महीने की 20 तारीख आ गयी . मैंने अपनी तरकीब लगाई और पेंचर वाले से पेंचर के दो बड़े रबर वाले स्टिकर खरीद लिए . अब मैंने सोचा चलो जूते का पेंचर लग जायेगा . आदतन आलस में ये काम संडे पर टाल दिया . इसी बीच संडे से पहले ही एक ओर कांड हो गया - टायर में फिर से पेंचर . मैं जैसे ही कोचिंग से उतरा देखा टायर फ्लैट . ये सब देख कर मेरा दिमाग भन्ना गया .मैं फिर पंहुचा राजू के पास उसने फ्लैट टायर देखा और बोला मैंने तो पहले ही कहाँ था . उसने टायर खोला और बोला दो पेंचर लगेंगे मैंने अपना गरीब वॉलेट निकला और वो दो पेंचर वाले स्टिकर उसके हाथ में रख दिए और राजू ने तिरछी निगाहो से देखा और बोला - वैरी स्मार्ट . अब जूता ख्वाइश से ख्वाब हो गया था और जूते का पेंचर मुझे उसी तली के छेद से निहार रहा था .
जिंदगी एक सफर है सुहाना यहां कल क्या हो किसने जाना
ReplyDeleteख्वाहिश से ख्वाब हो जाना ...ये पंक्ति इस पोस्ट की आत्मा प्रतीत होती है।
ReplyDeleteBahut khoob
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